#परीक्षा पर चर्चा 2021

माननीय प्रधान-मंत्री जी,

आपके द्वारा किया गया यह एक सराहनीय कदम है।छात्र, शिक्षक एवं अभिभावक सभी अपनी बात देश के मुखिया तक आनलाइन पहूँचा सकते हैं। यह वर्ष शिक्षा के क्षेत्र के लिए बहुत सारे नये बदलाव का वर्ष है। कोविड की वजह से शिक्षण संस्थान बंद रहें है। लगभग एक वर्ष तक छात्र स्कूल नही जा सके। आनलाइन शिक्षा सुरक्षित वातावरण में पढाई मे बहुत मददगार रहा है। पूरे वर्ष क्लास से लेकर परीक्षा तक आनलाइन हुए हैं। डिजिटल इंडिया का लाभ शिक्षण कार्य में काफी हुआ है। माननीय प्रधान-मंत्री जी, हमारे देश के सरकारी विद्यालयों में आनलाइन पढाई-लिखाई की व्यवस्था नहीं की जा सकी। सभी छात्रों के लिए ऐसी व्यवस्था की जाए। जिससे सभी को समान विकास करने का अवसर प्राप्त हो सके।

इंटरनेशनल चाइल्हुड कैंसर दिवस (ICCD) — 15 फ़रवरी।

Survival

15 फरवरी, इंटरनेशनल चाइल्हुड कैंसर दिवस, (ICCD) इंटरनेशनल सोसाइटी आॅफ पैडरियेटिक आनकोलाॅजी, ग्लोबल अवेयरनेस कैंपेन के तहत घोषित किया गया है। इस कैंपेन का उद्देश्य छोटे बच्चे एवं किशोर पेसेन्टस एवं उनके परिवारों की मदद करना है। इसका एजेंडा इस बीमारी से लड़ने वाले बच्चों के वैश्विक सरवाइवल रेट 60% तक करने का टार्गेट है। मैं बहुत सारे देशों के वेबसाइट पर, इस बारे में अध्ययन कर रही थी। जहाँ युरोपीय देशों के लोग एक-जुट हो कर संवेदनशीलता से इस समस्या पर विचार करते हैं। हमारे देश में इस पर बहुत कुछ करने की आवश्यक्ता है। अगर परिवार सम्पन्न है तो सुविधाओं तक पहुंच जाती है, अन्यथा ईश्वर जो चाहे…..।

मेरे लिखने का उद्देश्य है, कि मैं लोगों को इस बारे में संवेदनशील होने की अपील करूं। उम्मीद करती हूँ, कि मैं अपनी बात सही तरीके से रख सकूं। अगर हम समस्या की गंभीरता को समझेंगे, तभी सरकार भी कुछ कर पाएगी। क्योंकि इतने बड़े पैमाने पर कार्य करना, सरकार की मदद के बीना असंभव है।

चाइल्हुड कैंसर में, जहां अच्छे इन्कम वाले देशों में सरवाइवल रेट अच्छी है वहीं… लो इन्कम देशों में सब कुछ जैसे-तैसे होता है। हमारे यहाँ एन.जी.ओ हैं, परन्तु देश के पापुलेश के अनुपात में बहुत कम है। ये बेसिकली उपचार में ही मदद कर पाती है। जो काफी नहीं है। दान-पुण्य एवं धर्म के लिए, चाइल्ड मरीजों को गिफ्ट, एवं भोजन बांटे जाते हैं। हां, ये संवेदनशील होने की पहचान है। फिर भी परिस्थित बहुत चिन्तित कर देने योग्य है।

इस विषय पर गम्भीरता से विचार करने एवं बहुत बड़े पैमाने पर कार्य करने की आवश्यक्ता है। जिसके लिए चर्चा बहुत आवश्यक है। सबसे बड़ी समस्या हाइजीन की है। मैं कैसे लखु ?? कि….

हमारे देश में, कम-से-कम प्रशासन इतना संवेदनशील है — कि लो पर्वीलेज्ड पीपुल्स को सरवाइवल के लिए रोड के किनारे टेंट लगाने और भीख मांग कर जिंदा रहने की अनुमति देने की कृपा करती है। जहाँ कुछ उदार ह्रदय भोजन बांट सके। माताएं अपने राजदुलारों को सीने से लगाए, भीनभीनाति मक्खियों को भगाती टाॅवेल में लपेटे, हर बिमाड़ी से बचाने में सफल हो जाती हैं। मैं उन सब को ईश्वर मानती हूं। जो ऐसी परिस्थित में लड़ने का साहस करती हैं। ऐसा चमत्कार ईश्वर ही कर सकते हैं।

ये महशुस करना कि आगे क्या होगा ? पता नहीं… फिर भी बहुत लम्बे इलाज से गुजरना। कल कहां रहेंगे …. पता नहीं ? फिर भी इलाज को पूरी करेंगे, इस बात के विश्वास में जिंदा रहना। ऐसे हौसलों की ताकत बहुत बड़ी होती है। जो सिर्फ ईश्वर के पास होती है।

देश में कैंसर के लिए इन्फ्रास्ट्रक्चर का गंभीर अभाव है। ये बेसिक सुविधाएं हैं। जिस पर सभी का बेसिक अधिकार है। बीमारी की गंभीरता, बच्चे, सुविधाओं का अभाव समस्या को इतना जटिल बना देती है कि बीमारी से लड़ने की शक्ति कम हो जाती है। मनोबल साथ छोड़ने लगता है।

दुसरी तरफ अगर हम कल्पना करें, कि ऐसी बीमारी में सारी सुविधाए सरकार द्वारा दी जाए। रहने की साफ-सुथरी व्यवस्था से लेकर हाइजेनिक पौष्टिक भोजन तक की व्यवस्था सरकार द्वारा की जाए तो कितना अच्छा होगा। सरवाइवल रेट में अवश्य बढोतरी होगी।

कई बार हम कहते हैं, भारत में वैश्विक सुविधाओं के लिए कुछ नहीं किया जा सकता है। मैं कहना चाहूँगी — सिर्फ पाॅलिटीकल एजेंडा के लिए यदि स्टेचु आफ यूनिटी बनाई जा सकती है, बड़े-बड़े मंदिर-मस्जिद, गुरूद्वारे एवं पार्लियामेंट बनाए जा सकते हैं, तो हास्पीटल क्युं नहीं बनाया जा सकता है ?? वैश्विक सुविधाए क्युं नहीं दी जा सकती हैं ?? अगर नफरत के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है, तो सेवा के लिए क्युं कुछ नहीं किया जा सकता है ?? सोंचने की आवश्यकता है। हम जो चाहते हैं, हमारी सरकार हमे देती है। अगर हम मंदिर-मस्जिद गुरूद्वारे में ईश्वर को ढूंढेगे, तो हमे वो वहाँ मिलेगें या नहीं हम विश्वास से नहीं कह सकते हैं। परन्तु नर-सेवा से नारायण अवश्य मिलेंगे।

सरस्वती पूजा का चंदा।

ज्ञान की देवी, सरस्वती जी की पूजा करीब है। हर उम्र के विद्यार्थी पूजा की तैयारी मे संलग्न हो गए हैं। छोटे बच्चों के ग्रुप, उनसे बड़े बच्चों के ग्रुप, फिर सबसे बड़े बच्चों के ग्रुप।

मैं, पहले सबसे छोटे ग्रुप की बात करती हूँ। इन्हे जल्दी कोई चंदा नही देता है। ज्यादातर भगा दिये जाते हैं। इनके रोल मॉडल सबसे बड़े ग्रुप वाले भैया जी होते हैं। इनका मन कच्चे घरे के समान होता है। परन्तु, आस्था सच्ची होती है।

बीच के ग्रुप की विश्वास की सीमा बढ जाती है, क्योंकि माता के आशीर्वाद के बीना तो ये पास कर हीं नहीं सकते हैं। वर्ष बीत चुका है, और गया वक्त कभी वापस नहीं आता है। अब उन्हें पढने से कुछ याद नहीं रहता है। ऐसे में माता हीं एकमात्र सहारा है। ऐसे विद्यार्थी अवश्य पास कर जाते हैं, कैसे ? यह मैं आपको आगे बताऊंगी।

अब बारी आती है भैया जी ग्रुप की जिनके विद्यार्थी होने पर उन्हे स्वंय भी शंका होती है। ये ग्रुप आस्था के दिखावा का समाज में सबसे उत्तम उदाहरण होते हैं।

तीनो ग्रुपों की आस्था एवं स्वंय पर विश्वास का संतुलन को देखते हुए इंसान के आचरण को समझने का प्रयास किया जाए तो हमे मनुष्य का व्यवहार समझने में मदद मिलेगी।

पहले बच्चों का ग्रुप, अनुकरण करता है। दूसरे ग्रुप में जिस तरह के बच्चों की, मैं बात कर रही हूँ, उनका स्वंय से दूरी इतनी बढ जाती है, कि पढा हुआ कुछ याद नहीं रहता है। ऐसे में ईश्वर पर अत्याधिक निर्भरता बन जाती है। वे कैसे भी पास कर जाते हैं, चाहे तरीका गलत हीं क्यों न हो। ईश्वर को इन सब के रचयिता मान कर भाग्यवादी बन जाते हैं। उन्हें कर्म पर विश्वास नहीं रह जाता है।

तीसरा भैयाजी ग्रुप …..जो करते हैं, उसे पूजा नहीं माना जा सकता है। उनका मन पूजा के लिए तैयार नहीं हो पाता है। वे अपनी ताकत के नशे में होते हैं।

हमारा समाज भी, ऐसे ही तीन ग्रुप के बच्चों का विकसित स्वरूप है।

मुझे लगता है, सरस्वती पूजा पर हमे पूजा के सही अर्थ को समझने का प्रयास करना चाहिए। सरस्वती जी के स्वरूप मे उनके चार हाथों में अलग – अलग चीजें है, जो हमे अपने आत्म ज्ञान को चारो ओर से बढाने को प्रेरित करती हैं। वीणा हमे अपनी आत्मा के राग को सुनने के लिए प्रेरित करती है, साथ हीं माला हमे एक-साथ रहने के लिए प्रेरित करती है। वेद हमें ज्ञान की ओर ले जाती है। सफेद वस्त्र हमें स्वच्छ चरित्र अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं।

……..तो इस सरस्वती पूजा हम अपने मन के राग को सुने और, स्वच्छ चरित्र के साथ आगे बढें।

#matdatadiwas@25jan#republicday@26jan.

स्वतंत्रता, समानता एवं व्यक्ति की गरिमा नागरिक के मौलिक अधिकार हैं। ये अधिकार विश्व के सभी देशों के संविधान मे है। इन मूल्यों को प्राप्त करने के लिए विधान मे परिवर्तन होते रहे है और होते रहेंगे। विधान में परिवर्तन एक गतिशील प्रकृया है।

अपने देश मे हम वर्ष मे दो बार झंडे के नीचे खड़े होकर भारतीय होने का गौरव अनुभव करते हैं। एक बार स्वतन्त्रता के लिए और दूसरी बार विधान लागू होने के उपलक्ष्य मे।

स्वतन्त्रता जहाँ अधिकार देती है, विधान स्वतन्त्रता की सीमा बतलाती है अर्थात स्वतन्त्रता असीमित नहीं है। हम स्वंय स्वतंत्र हैं, परन्तु दूसरे व्यक्ति की स्वतन्त्रता की सीमा को अक्षुण्ण रख कर। यह एक संतुलन है। जिसमे स्वंय को एक व्यक्ति मान कर, निष्पक्ष निर्णय लेना आवश्यक है।

स्वतंत्रता का अर्थ स्वंय से रक्षा भी है। स्वंय को व्यक्ति मान कर कार्य करना एक तप है। जिसमे  दूसरे व्यक्ति की स्वतंत्रता का ध्यान रखते हुए स्वंय को पूर्ण अधिकार देना है। इस तरह सबकुछ फिर से व्यक्ति पर ही निर्भर करती है। यह एक चक्र के समान है। जिसमे प्रत्येक दूसरे से उर्जा प्राप्त करती है।

हमारे यहाँ व्यक्ति समान नहीं है, — कमज़ोर एवं बलवान(जाति/ लिंग/ अमीर/गरीब) के आधार पर। वे एक – दूसरे मे ऐसे गुथे हैं मानो एक – दूसरे के लिए बने हो। कमज़ोर ने बलवान का संपोषण किया है या बलवान ने कमज़ोर का। या फिर दोनो ने एक- दूसरे को कुपोषित किया है। एक तरीके से ये एक समान लगते हैं। यहाँ एक पक्ष स्वंय को व्यक्ति नही मानता है तो दूसरा अपने अधिकारों की सीमा नहीं पहचानता है। दोनो परिस्थितियाँ व्यक्ति का पतन है।

समानता एवं स्वतंत्रता का सन्तुलन युक्तिसंगत होनी चाहिए। यह आवश्यक है कि नीतियां सभी के कल्याण के लिए बनाई जाए, चुनावी लाभ देखकर नहीं। नागरिको को भी “स्वंय को व्यक्ति” के रूप मे देख कर निर्णय लेना चाहिए।

संविधान देश को समर्पित करते समय भी बाबा भीमराव अंबेडकर ने कहा था — यह व्यक्ति पर निर्भर करती है, कि वे देश के संविधान को किस दिशा में ले जाएं।

रेत से रिश्ते

रेत से रिश्ते ये लड़कपन के

रेत से रिश्ते ये लड़कपन के।

बेफिक्र बेपरवाह….समंदर जैसे।

लहरों की ठोकर से अक्सर ढह जाते हैं।

ढह कर कुछ युं बंट जाते हैं…

कुछ रेत के संग …

तो कुछ समंदर में समा जाते हैं।

ये रेत के रिश्ते लड़कपन के ।

बेफिक्र बेपरवाह…समंदर जैसे।

बेशक इन रिश्तों की उम्र है…खिलौनों जितनी…

तय है टुटना और नये से बदले जाना।

टुट कर भी रहती है लहरों की तरह…

छुट कर बन जाती है ये…

अनमोल मोती।

रेत से रिश्ते ये लड़कपन के,

बेफिक्र बेपरवाह समंदर जैसे।

संवरने के लिए

फिर से संवरने के लिए।

नई सुबह में जागना….शाम बिखर जाना।

नये स्वप्न को रचना….उनका टुट जाना।

संवरने के लिए।

क्योकि बिखरी चीजें ही…तो बनती हैं।

टुट कर हीं तो कुछ संवरती हैं।

यह प्रकृति की संवारने की…अपनी कला है।

तोड़कर फिर से गढने की परंपरा है।

टुट कर बिखर जाना…एक उपचार है।

अपरिचित चीजो से परिचय का एक तरिका है।

अगर टुट कर जो बिखर गए तो समझ लेना।

कि जीवन मिली है तुम्हे….

फिर से संवरने के लिए।

पद्मा श्रीवास्तव 🌿